पृष्ठम्:कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्.pdf/४८६

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460 अर्थशास्खे अशुद्धम् शुद्धम् तत्सिद्धौ गृहन्ति स्यात् 2751 276 288 301 12 306 310 10 312 17 313 314 815 316 316 18 3183 322 तत्सिद्धो गृह्णान्ति स्सात् सम्मन्न जगीषो पौर यस्याश्च सन्धि मिति स्थि हीयेत सम्पन्न जिगीषो पौर यश्चास्य सन्धिः मति स्थित हियेत पुजन मित्र पूजन मुख्यः 333 मुख्यः सामादि 334 336 340 346 346 15 3484 349 19 3508 स्मीन सामदि विश्न कोप सितमात्मदोष गृहीतुं कोपः। तमात्मदोष ग्रहीतुं खनि अधार्मिक अर्धामक